Tuesday, 8 November 2016

गुड्डू का दर्द


आज फिर से गुड्डू परेशान था | उसकी चिर परिचित आँखे मानो अपने आप से शिकायत कर रही हो |

                    मैं दूर से समझने की कोशिश कर रहा था | आखिर क्या हैं जो उसे परेशान किये जा रही हैं|

आज उसकी आँखे कुछ  सी थी कुछ नम, आज फिर उसको तकलीफ हुई  हैं | लेकिन इस बार माजरा कुछ और हैं | इस बार शायद उसे तकलीफ हैं अपने से |

मुझसे रहा गया और मैंने पूछ ही लिया, क्या बात हैं क्यू परेशान हो | बजाय जवाब देने के उसने उलट कर पुछा |

अच्छा एक बात बताओ तुमको अगर सिचुएशन दिया जाय, जिसमे तुम सिर्फ या तो अच्छे  बेटे बन सकते हो या अच्छे बाप, फिर तुम क्या करोगे ?

मैंने बहुत सोच कर बताया की मैं तो अच्छा बाप बनना पसंद करूंगा |

फिर उसने बताया की आज उसने उल्टा किया हैं, उसने अपने तीन साल के  बच्चे किया वादा तोड़ दिया, ताकि वो एक अच्छा बेटा बन सके, अब उसका तीन साल का बच्चा पूछ रहा हैं की पापा आपने वादा क्यू तोडा तो मेरे पास कोई जबाब नहीं हैं |

मैं उसके तकलीफ का कारण समझ गया था, मैंने ज्यादा पुछा नहीं |

मेरे मन में अचानक से सारी याद ताजा हो गयी, उसने अपने बच्चे के पहले जन्मदिन पर भी ऐसा ही किया था |

मैं रिश्तो के जाल में उलझता जा रहा था , मैं समझ नहीं पा रहा था की आखिर शादी से पहले के रिश्ते नए रिश्तो की अहमियत क्यू नहीं समझते, हमेशा ऐसा परिश्थिति पैदा क्यू करते हैं जिससे या तो ये या वो वाली नोबत आती हैं | एक लड़के के साथ हमेशा गलत ही क्यू होता हैं उसको हर रिश्तो को सही से निभाने का मौका मिलना चाहिए |

मुझे उसकी ही एक घटना याद गयी जिसमे ससुराल वालो के उसके घर पर पहली बार आने पर किया गया कोई प्रोग्राम उसने कैंसिल किया था |

जिंदगी में मैक्सिमम पॉसिबिलिटी के लिए जरूरी हैं की दूसरे तरफ की बातो को समझने की कोशिश की जाय |

मुझे नहीं समझ रहा था बेटे से लोग दुश्मनी क्यू निकलते हैं , उनको क्यू ये समझ नहीं आता दोनों में से एक चुनने में उनका अपना ही मरता हैं |

मुझे अक्सर ये शिकायत रहती हैं उससे वो बोल क्यू नहीं देता ये मुझसे हो पायेगा ||

मुझे समझ रहा था लोग बेटे को टेस्ट करते रहना चाहते हैं कही बदल तो नहीं गया, बदल जाने पर शिकायत करते हैं, बागवान मूवी के अमिताभ के " टूटे फूटे बर्तन " के तरह |

यही रिश्तो की कसमकश हैं ऐसा सोच मैं सिगरेट जलाने लगा था |

Monday, 28 March 2016

गुड्डू का पुल

आज गुड्डू बड़ा परेशान सा था, आज फिर से सेटमैक्स "बागवान" मूवी आ रही थी । मानो उसीमे वो भी जी रहा था। वो टूटे फूटे बर्तन, वो सीढ़ी वाला डॉयलॉग उसे चुभता जा रहा था। 
मुझे उसकी ये हालत देखी नहीं जा रही थी, मैंने पूछ  ही लिया। तुम अपने  को पहले की पीढ़ी में पाते हो या आज की प्रैक्टिकल पीढ़ी में पाते हो। 
वो बड़ी देर तक मुझे घूरता रहा,शायद जबाब सोच रहा था या जबाब देने की उसकी इक्छा  नहीं थी। कुछ देर सोचने के बाद वो बोला की मैं अपने को पूल की तरह पाता हूँ। मैं समझ नहीं पाया, ये पूल का क्या मतलब हैं ?
जिंदगी दो किनारों के बीच चलती हैं , एक किनारा शादी से पहले का एक शादी के बाद का । कोई भी किनारा टुटा तो समझो जिंदगी का तारतम्य टूट जाएगा । 
उसने समझाया तो मैंने सर हिला दिया। 
आगे वो समझाने लगा की दोनों किनारों के बीच एक बड़ा सन्नाटा हैं। दोनों किनारे  आपस में उचाई नापते हैं और सोचते हैं  की उसे उसके होने का महत्त्व सामने वाला किनारा समझता क्यों नहीं हैं। शायद एक दूसरे के होने की वजह से दोनों अनमने हैं। शायद कोई किनारा छूटकारा चाहता हैं इस तानेबाने को संभाले रखने में । 
मैं थोड़ा न समझने के भाव से पूछा की तुम कहा हो, क्या तुम नदी रूपी जीवन हो?
उसने मुस्कुराते हुए जबाब दिया मैं नदी कैसे हो सकता हूँ वो तो जीवन हैं जिसे "मैक्सिमम पोसिब्लिटी" की ओर जाना हैं वो सबको निरंतरता प्रदान करती हैं । 
मैं तो वो पूल हूँ जो दोनों किनारों के बीच संवाद करता हैं  ताकि जीवन की निरंतरता चलती रहे। 
मैं अब समझ रहा था उसकी बातो को, मैंने उससे आगे पूछा की पूल की क्या जरूरत हैं, किनारे तो कही आ जा सकते नहीं । 
वो चुप सा हो गया, वो सोच रहा था संवाद की जरूरत सही में हैं क्या, संबाद कर के दूसरे किनारे की जरूरत को समझाया जा सकता हैं क्या? ये पूल क्यों दोनों के अनमने पन का शिकार हो? पूल पर ये आरोप हमेशा लगता हैं की वो दूसरे किनारे की तरफ जयादा झुका हैं । क्या पूल बिच से टूट जाय तो चलेगा क्या ? पूल का जो भाग जिस किनारे से लगा हैं वो उस किनारे का, किस्सा ही खत्म । लेकिन जीवन की निरंतरता खतरे में पर सकती हैं |

क्या पूल  दो भागो में टूटे तो पूल को दर्द नहीं होगा, पर किनारे को उस दर्द का एहसास कैसे हो सकता हैं । और  ये दर्द का जिम्मेवार कोन हैं, गलती तो पूल की हैं की वो दोनों किनारे की सन्नाटो को मिलाने चला था, दोनों किनारों को मिलाने चला था, भला ये मुंकिन हैं क्या । 
 मैं देख रहा था गुड्डू लगातार सोच के सागर में गोता लगाए जा रहा था, मैं सोच रहा था की वो सचमुच पूल को बिच से तोडने की बात तो नहीं सोच रहा। लेकिन मैंने उससे पूछा नहीं। 
 मैंने देखा की तकलीफ उसके चेहरे पर उभर कर आ रही हैं शायद आँखे भी नम हैं, पर ये क्या उसकी आँखो में तो बदले का भाव आ रहा था । 
मैं मुस्कुराने लगा पूल भला किनारों से कैसे बदला ले सकता हैं, मैं मुस्कुराते हुए अंजाम सोच रहा था "किनारों से बदला लेने की चाहत में जगह जगह से टुटा पूल"। 
मैंने उसके चुपी को तोड़ने के लिए अगला सवाल पूछा । 
ये आज कल की प्रैक्टिकल पीढ़ी पहले की तरह पिछले पीढ़ी की तरह क्यों नहीं सोचती ये सबको यूज़ एंड थ्रो क्यू करती हैं ?क्या प्यार कम हो गया हैं ?
उसने जोर से बोला  नहीं..... ऐसा नहीं हैं इसका कारण लोगो की जरूरतों का बढ़ना हैं और इसकी कीमत सबसे जयादा पिछली पीढ़ी को चुकानी पर रही हैं । 

उसकी आँखों में परेशानी के भाव साफ़ देखे जा सकते थे । पर वो शांत था, पता नहीं क्या था उसके मन में, शायद कोई सोलुशन सोच रहा था । 

मैं उसे उसकी हाल पर छोडते हुए " बागवान"  मूवी  का मजा लेने लगा था ।